सजीव सारथी का नाम इंटरनेट पर कलाकारों की जुगलबंदी करने के तौर पर भी लिया जाता है। वर्चुएल-स्पेस में गीत-संगीत निर्माण की नई और अनूठी परम्परा की शुरूआत करने का श्रेय सजीव सारथी को जाता है। अक्टूबर 2007 में सजीव ने संगीतकार ऋषि एस के साथ मिलकर कविताओं को स्वरबद्ध करने की नींव डाली। सजीव के निर्देशन में ही 3 फरवरी 2008 को अनूठी संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी हुआ जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे।

4 जुलाई 2008 को उन्होंने 'आवाज़' मंच की विधिवत शुरूआत की, 4 जुलाई से लेकर 31 दिसम्बर 2008 तक सजीव के नियंत्रण में प्रत्येक शुक्रवार एक गीत रीलिज किया गया, जिससे 60 से अधिक कलाकारों (गायकों, संगीतकारों और गीतकारों) को एक विश्वव्यापी मंच मिला। आवाज़ ने 'पॉडकास्ट कवि सम्मेलन', 'सुनो कहानी', 'ओल्ड इज़ गोल्ड', 'महफिल-ए-ग़ज़ल', 'ताज़ा सुर ताल', 'ऑनलाइन पुस्तक विमोचन', 'गीतकास्ट प्रतियोगिता' जैसे कई लोकप्रिय स्तम्भों की शुरूआत की। दूसरे सत्र के संगीतबद्ध गीतों को रीलिज करने की कड़ी में सजीव सारथी द्वारा 10 गीत लिखे गये। सजीव ने भारत में रूसी दूतावास के लिए 'भारत-रूस मित्रता' पर 'द्रुज़बा' गीत की रचना की।

जन्म हुआ २४ फरवरी १९७४ को दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव में। चार साल के थे जब दिल्ली आये, तब से यहीं हैं। बचपन से ही साहित्य, संगीत और सिनेमा, इनके जीवन के आधार रहे, वाणिज्य में सनातन किया ताकि कोई अच्छी नौकरी मिले वो मिली भी, पर मन हमेशा रचनात्मक कार्य-कलापों में ही लगा। स्कूल से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी शुरू हो चुकी थी, जो कॉलेज़ में पहुँच कर अपने चरम पर पहुँची।

मूलतः एक गीतकार हैं, जो कविताओं में अपने आपको तलाश करते हैं, कहानी-पटकथा-संवाद भी लिखते हैं. २०१० में इनकी कुछ कवितायेँ "संभावना डॉट कॉम" में प्रकाशित हुई, तत्पश्चात साल २०११ में इनकी कविताओं का पहला संकलन "एक पल की उम्र लेकर" हेवंली बेबी बुक्स कोच्ची ने जारी किया, जो फ्लिप्कार्ट और अन्य माध्यमों से पूरे भारत में उपलब्ध हुई और पाठकों की जबरदस्त सराहना भी इसे प्राप्त हुई. २०११ नवंबर में प्रदर्शित फिल्म "DAM 999" का सबसे लोकप्रिय गीत "बात ये क्या है जो" सजीव की कलम से ही निकला. डी डी कश्मीर के धारावाहिक "कुर्बत" का शीर्षक गीत भी सजीव ने लिखा. प्लेबैक इंडिया के सञ्चालन के साथ साथ सजीव और भी बहुत सी रचनात्मक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय हैं.

गीतकार कवियों को अधिक पढ़ते हैं, इसलिये जाहिर है कि गुलज़ार, जावेद अख़्तर, निदा फ़ाज़ली, नीरज, इंदीवर, मजरूह, रविंद्र जैन सभी धड़कनें हैं इनकी, यूँ तो थोड़ा-थोड़ा निराला, नागार्जुन, बशीर बद्र, मीर, ग़ालिब सभी को पढ़ा है। शैलेंद्र इनके अतिप्रिय हैं जिनकी इन दो पक्तियों में इनके अनुसार इनके जीवन का सार है-

"आबाद नहीं बरबाद सही, गाता हूँ ख़ुशी के गीत मगर,
जख्मों से भरा सीना है मेरा , हँसती है मगर ये मस्त नज़र"

संपर्क-
७७७, सेक्टर ६
आर के पुरम, नई दिल्ली-११००२२
sajeevsarathie@gmail.com
09871123997


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